महाशिवरात्रि व्रत कथा शिवरात्रि की कहानी Mahashivratri vrat Katha

By | March 7, 2021
महाशिवरात्रि व्रत कथा शिवरात्रि की कहानी Mahashivratri vrat Katha

महाशिवरात्रि व्रत कथा शिवरात्रि की कहानी Mahashivratri vrat Katha

Mahashivratri vrat Katha: मित्रों अधिकतर जनमानस से ही जानते हैं कि महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के उपलक्ष में मनाया जाता है लेकिन कुछ विद्वानों का मानना है कि शिवरात्रि के दिन ही भगवान शिव ने धान कूट नाम का विष पिया था जो सागर मंथन के समय समुद्र से निकला था परंतु शिवपुराण में एक शिकारी से जुड़ी कथा का वर्णन किया गया है आज की इस वीडियो में हम आपको शिवपुराण में वर्णित महाशिवरात्रि की कथा बताने जा रहे हैं नमस्कार दर्शकों एडवांटेज पर आपका एक बार फिर से स्वागत है

शिव पुराण की कुटी रुद्र संहिता में वर्णित कथा के अनुसार पौराणिक काल में किसी वन में एक भीड़ रहता था जिसका नाम गुरु ग्रुप था उसका परिवार बड़ा था मैं बलवान और क्रूर स्वभाव का होने के साथ ही टूटता पूर्ण कर्म किया करता था मैं प्रतिदिन बंद में जाकर हिरण और अन्य जानवरों को मारता और वहीं रहकर नाना प्रकार की छोरियां करता था अपने बचपन से ही कभी कोई शुभ कर्म नहीं किया था इस प्रकार 1 में रहते हुए उस दुरात्मा भील का बहुत समय बीत गया तदनंतर एक दिन बड़ी सुंदर एवं शुभ कारक शिवरात्रि आई कि तू भाई दुरात्मा घने जंगल में निवास करने वाला था इसलिए उस व्रत के बारे

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में वह नहीं जानता था उसी दिन उस भील के माता पिता और पत्नी भूख से व्याकुल होकर उससे खाने की मांग करने लगे उनके बार-बार याचना करने पर वह भी तुरंत धनुष लेकर बंद की ओर चल दिया और हिरणों के शिकार के लिए सारे वन में घूमने लगा दे वियोग से उसे उस दिन कुछ भी नहीं मिला और सूर्य अस्त हो गया इससे उसको बड़ा दुख हुआ और मैं सोचने लगा कि मैं क्या करूं कहां जाऊं आज तो कुछ नहीं मिला घर में जो बच्चे हैं उनका तथा माता-पिता का क्या होगा जो मेरी पत्नी है

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उसकी भी क्या दशा होगी अतः मुझे कुछ लेकर ही घर जाना चाहिए ऐसा सोच कर मैं ब्याज यानी शिकारी एक जलाशय के समीप पहुंचा और वहां पर में उतरने का घाट था वहां जाकर खड़ा हो गया और मन ही मन यह विचार करने लगा कि यह कोई ना कोई जीव पानी के लिए अवश्य आएगा उसी को मारकर उसे साथ लेकर प्रसन्नता पूर्वक घर को जाऊंगा ऐसा निश्चय करके वेब याग्निक बेल के पेड़ पर चढ़ गया और वहीं चल साथ लेकर बैठ कर उसके मन में केवल यही चिंता थी कि कब कोई जीव आएगा और कब मैं उसे मारूंगा इसी प्रतीक्षा में भूख प्यास से पीड़ित वहां बैठा रहा इस तरह काफी रात हो गई और जब रात का पहला प्रारंभ हुआ तो एक प्यासी हिरनी

वहां आई जिसे देखकर उस बात को बड़ा हर्ष हुआ और उसने तुरंत ही उसे मारने के लिए अपने धनुष पर एक बाण का संधान लिया ऐसा करते हुए उसके हाथ के धक्के से थोड़ा सा जल और बिल्वपत्र नीचे गिर पड़े उस पेड़ के नीचे शिवलिंग था जिसके बारे में वह ब्याज नहीं जानता था इस तरह उस जल और बिल्वपत्र से शिव की प्रथम प्रहर की पूजा संपन्न हो गई उस पूजा के महत्व से उस व्यास का बहुत साफ आप तत्काल नष्ट हो गया उधर होने वाली कक्षा 8 की आवाज को सुनकर निर्णय से ऊपर की ओर देखा विवाद को देखते ही वह व्याकुल हो गई और बोलिए आप क्या करना चाहती हो मेरे सामने सच सच बताओ ऋणी की बातें सुनकर भी आपने कहा आज मेरे परिवार के लोग भूखे हैं

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आता तुमको मार कर रहे हो कि भूख मिटा लूंगा और उन्हें तृप्त करूंगा व्यास का भी दारू वचन सुनकर तथा दुष्ट भी को भारत आने दे हिरनी सोचने लगी कि अब मैं क्या करूं कहां जाऊं अच्छा कोई उपाय सोचती हूं ऐसा विचार कर लेना याद मेरी मां से तुम को सुख होगा इस अनत कारी शरीर के लिए इससे अधिक महान पुण्य का कार्य और क्या हो सकता है उपकार करने वाले प्राणी को इस लोक में जो पुण्य होता है उसका 100 वर्षों में भी वर्णन नहीं किया

जा सकता परंतु इस समय मेरी सब बच्चे मेरे आश्रम में ही है मैं उन्हें अपनी बहन को अथवा स्वामी को सौंप कर लौट आऊंगी वह तुम मेरी इस बात को मित या ना समझो मैं फिर तुम्हारे पास लौट आऊंगी क्योंकि सत्य से ही धरती टिकी हुई है सत्य से ही समुद्र अपनी मर्यादा में स्थित है और सत्य से ही नजरों से जल की धाराएं गिरती रहती है सत्य में ही सब कुछ स्थित है हिंदी के ऐसा कहने पर जब याद नहीं उसकी बात नहीं मानी तब उसने अत्यंत आवश्यक एवं भयभीत हो करणी बोली ब्याज सुनो मैं तुम्हारे सामने ऐसी शपथ खाती हूं जिससे पर जाने पर मैं अवश्य तुम्हारे पास लौट आऊंगी ब्राह्मण यदि वेद बेचे और तीनों काल संध्या वंदन ना करें तो उसे जो पाप लगता है

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पति की आज्ञा का उल्लंघन करके सूचना अनुसार कार्य करने वाली स्त्रियों को जिस बाप की प्राप्ति होती है किए हुए उपकार को ना मानने वाले भगवान शंकर से विमुख रहने वाले तथा विश्वासघात और छल करने वाले लोगों को जो पाप लगता है उसी पाप से मैं भी लिप्त हो जाऊं यदि लौटकर नाउ इस तरह अनेक शपथ खाकर जो भी नहीं चुपचाप खड़ी हो गई तब उसे याद में उस पर विश्वास करके कहा अच्छा तुम अपने घर को जाओ जब ही नहीं बड़े हर्ष

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के साथ पानी पीकर अपने आश्रम मंडल में गई इतने में ही रात का वह पहला प्रहार विवाद के जाते जाते ही बीत गया तब उसे अग्नि की बहन दूसरी हनी जिसका पहली ने स्मरण किया था उसी की राह देखती हुई जल पीने के लिए वहां आ गई उसे देखकर भील ने स्वयंवर को तरफ से खींचा ऐसा करते समय पुनः पहले की भांति भगवान शिव के ऊपर चल और बेलपत्र गिरी उसके द्वारा महात्मा शंभू की दूसरे प्रहर की पूजा संपन्न हो गई यद्यपि वह प्रसंग वशी हुई थी

तो भी व्यास के लिए सुख दायिनी हो गई हिंदी ने उसे बाढ़ की स्थिति पूछा फर्नीचर यह क्या करते हो याद में पूर्वोत्तर दिया मैं अपने भूखे को तुम को तृप्त करने के लिए तुझे मारूंगा यह सुनकर मैं हिंदी बोली मेरा देह धारण सफल हो गया क्योंकि इस अनित्य शरीर के द्वारा उपकार होगा परंतु मेरी छोटे-छोटे बच्चे घर में है अतः मैं एक बार जाकर उन्हें अपने स्वामी को सौंप दूं फिर तुम्हारे पास लौट आऊंगी की बात सुनकर बाद बोले मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं है मैं तुम्हें मारूंगा इसमें संशय नहीं है याद की बातें सुनकर ही नहीं भगवान विष्णु की शपथ खाती हुई बोली व्यास जो कुछ मैं कहती हूं उसे सुनो यदि मैं लौट कर ना आऊं

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तो अपना सारा पुणे हार जाओ क्योंकि जो वचन देकर उससे पलट जाता है वह अपने पुणे को हार जाता है जो पुरुष अपनी विवाहिता स्त्री को त्याग कर दूसरी के पास जाता है वैदिक धर्म का उल्लंघन करके कपोल कल्पित धर्म पर चलता है भगवान विष्णु का भक्त हूं कर शिव की निंदा करता है माता-पिता की निधन तिथि को श्राद्ध आदि ना करके उसे सुना बिता देता है तथा मन में संत आपका अनुभव करके अपनी बीवियों के वचन को पूरा करता है ऐसे लोगों को जो पाप लगता है

वही मुझे भी लगे यदि मैं लौट कर ना हो हिरनी के ऐसा कहने पर ब्याज नहीं कहा जाओ उसके बाद हिंदी जल्दी कर हर्ष पूर्वक अपने आश्रम को गई इतने में ही रात का दूसरा प्रहर भी बेहद के जाते-जाते बीत गया इसी समय तीसरा प्रारंभ हो जाने पर हिंदी के बहुत विलंब हुआ जहां पर आज उसकी खोज करने लगा इतने में ही उसने जल के मार्ग में एक हिरन को देखा वह बड़ा हष्ट पुष्ट था उसे देखकर व्यास को बड़ा हर्ष हुआ और वह धनुष पर बाण रखकर उसे मार डाले को उद्धत हुआ ऐसा करते समय उसके प्रारब्ध बस कुछ जल और बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे उससे उसके सौभाग्य से भगवान शिव की तीसरे पहर की पूजा भी संपन्न हो गई इस तरह भगवान ने उस

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पर अपनी दया दिखाई पत्तों के गिरने की आवाज सुनकर उस हिरण ने विवाद की ओर देखा और पूछा क्या करते हो व्यास ने उत्तर दिया मैं अपने कुटुंब को भोजन देने के लिए तुम्हारा बात करूंगा वह आपकी बात सुनकर हिरण की मन में पड़ा हर्ष हुआ और तुरंत ही बोले मैं धन्य हूं मेरा हष्ट पुष्ट शरीर होना सफल हो गया क्योंकि मेरे शरीर से आप लोगों की तृप्ति होगी जिसका शरीर परोपकार के काम में नहीं आता उसका सब कुछ बयां कर चला गया जो सामर्थ्य रहते हुए भी किसी का उपकार नहीं करता उसकी वह सामर्थ्य व्यस्त चली जाती है तथा वह परलोक में नर्क गामी होता है

परंतु एक बार मुझे आने दो मैं अपने बालकों को उनकी माता के हाथ में सौंप कर और उन सबको धीरज बनाकर यहां लौट आऊंगा उसके ऐसा करने पर ब्याज मन ही मन पड़ा विस्मित हुआ उसका हृदय कुछ शुद्ध हो गया था और उसके सारे पाप नष्ट हो चुके थे उसने हिरन से कहा जो यहां आए वह सब तुम्हारी तरह बातें बना कर चले गए परंतु वह अभी तक यह नहीं लौटे हिरन तुम भी इस समय संकट में हूं इसलिए झूठ बोल कर चले जाओ फिर आज मेरा जीवन निर्वाह कैसे होगा प्यार की बातें सुनकर हिरण बोले व्यास में जो कुछ कहता हूं उसे सुनो मुझ में

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असत्य नहीं है सारा चराचर ब्रह्मांड सत्य से ही टिका हुआ है जिसकी वाणी झूठी होती है उसका पुण्य नष्ट हो जाता है तथा पीवीआर तुम मेरी सच्ची प्रतिज्ञा सुनो संध्या काल में मिथुन तथा शिवरात्रि के दिन भोजन करने से जो पाप लगता है झूठी गवाही देने धरोहर को हड़प लेने तथा संध्या ना करने से दूज को जो पाप होता है वही पाप मुझे भी लगे यदि मैं लौट कर रहा हूं जिसके मुख से कभी शिव का नाम नहीं निकलता जो सामर्थ्य रहते हुए भी दूसरों को उपकार नहीं करता पर्व के दिन श्री फल तोड़ता भक्ति भक्षण करता तथा शिव की पूजा किए बिना और भस्म लगाए बिना भोजन कर लेता है

इन सबका पाठक मुझे लगे यदि मैं लौट कर ना उसकी बात सुनकर भी आदमी कहा जाओ शीघ्र लौटना बिहार के ऐसा कहने पर हिरण पानी पीकर चला गया वह सब अपने आश्रम पर मिले तीनों ही प्रतिज्ञा बंद हो चुके थे आप कश्मीरी दूसरे के वृतांत को भलीभांति सुनकर सत्य के पास से बंधे हुए उन सब ने यही निश्चय किया कि वहां अवश्य जाना चाहिए इस विषय के बाद वहां बालकों को आश्वासन देकर इस सब के सब जाने के लिए उत्सुक हो गए उस समय जीती हिरनी ने अपने स्वामी से कहा स्वामी आपके बिना यह बालक कैसे रहेंगे प्रभु

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मैं नहीं वहां पहले जाकर प्रतिज्ञा की है इसकी केवल मुझको जाना चाहिए आप दोनों यही रहे उसकी यह बात सुनकर छोटी हिंदी बोली बहन मैं तुम्हारी सेविका हूं इसलिए आज मैं व्यास के पास जाती हूं तुम यहीं रहो यह सुनकर हीरोइन बोले मैं ही वहां जाता हूं तुम दोनों यहां रहो क्योंकि बच्चों की रक्षा माता से ही होती है तो हमें की है बात सुनकर दोनों ही नहीं बोली प्रभु पति के बिना जीवन को धिक्कार है तब उन सब ने अपने बच्चों को सांत्वना देकर उन्हें पड़ोसियों के हाथ में सौंप दिया और स्वयं शीघ्र ही उस स्थान को प्रस्थान किया जहां भाई ब्याज शिरोमणि उनकी प्रतीक्षा में बैठा था उन्हें जाते देख उनके सब बच्चे पीछे पीछे चले उन्होंने निश्चय कर लिया था कि माता-पिता की जो गति होगी वही हमारी भी हो उन सब को एक साथ आया हुआ देख व्यास को बढ़ा हसुआ उसने धनुष पर बाण रखा उस समय पुनः जैन और बेलपत्र शिव के ऊपर के हिस्से शिव के चौथे प्रहर की शुभ पूजा भी संपन्न हो गई उसमें व्यास का सारा पाप तत्काल भस्म हो गया इतने में ही तो रोहिणी और हिरन बोल उठे ब्याज शिरोमणि शीघ्र कृपा करके हमारे शरीर को सार्थक करो उनकी यह बात सुनकर व्यास को बड़ा विश्व

में हुआ शिव पूजा के प्रभाव से उसको दुर्लभ ज्ञान प्राप्त हो गया उसे सोचा यह हिरण ज्ञान ही पशु होने पर भी ठंड है क्योंकि आज ही होकर भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं लेकिन धिक्कार है मेरे जीवन को कि मैं अनेक प्रकार के कुकृत्य उसे अपने परिवार का पालन करता अब उसने अपने बाल रोक लिए तथा वर्गों से कहा कि वे सब धन है तथा उन्हें वापस जाने दिया उसके ऐसा करने पर भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर तत्काल उसे दिव्य स्वरूप का दर्शन करवाया तथा उसे सुख समृद्धि का वरदान देकर नाम प्रदान किया मित्रों यही बहुत था जिसके साथ भगवान श्रीराम ने मित्रता की थी मित्रों महाशिवरात्रि की कथा यहीं समाप्त होती है अगर आपको पसंद आई हो तो इसे ज्यादा से ज्यादा लाइक करें और शेयर करें

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महाशिवरात्रि व्रत कथा शिवरात्रि की कहानी Mahashivratri vrat Katha: watch video

video credit: The divine Tales

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